Rajasthan Pride: राजस्थान के इस गांव में आज भी पत्थर के बर्तनों क्यों खाना खाते हैं लोग…?

अलवर : राजस्थान अपनी परंपराओं और भोजन विविधताओं के लिए दुनियाभर प्रसिद्ध है. विदेशी सैलानियों को भी यहां के भोजन खूब पसंद आते हैं. राजस्थान के अलवर जिले में एक ऐसा गांव है, जहां लोग आज भी पत्थर के बर्तनों ने दाल बाटी चूरमा खाते हैं. तो चलिए जानते हैं, कि आज के आधुनिक युग में भी यहां के लोग पत्थर के बर्तनों में खाना क्यों खाते हैं.

राजस्थान के अलवर से करीब 50 किमी दूरी पर रैणी तहसील में एक गांव पड़ता है, जिसका नाम डोरोली है. इस गांव में बहुत प्रसिद्ध मंदिर है. बताया जाता है, कि इस मंदर में खाना बनाने से लेकर खाने तक सिर्फ पत्थर के बर्तनों का प्रयोग किया जाता है. हालांकि, यहां धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं, लेकिन आज भी इस मंदिर में तैयार किया जाने वाला दाल बाटी चूरमा पत्थरों के बर्तन में ही तैयार होता है, और पत्थर के बर्तनों में ही खाया जाता है.

पत्थर के बर्तनों में क्यों खाते हैं लोग

बताया जाता है, कि रैणी तहसील का डोरोली गांव तीन तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है. एक वक्त था, जब  यहां बड़ी तादाद में पत्थरों के बर्तन तैयार किए जाते थे. लगभग 3 दशक पहले इस गांव के आस-पास के इलाके में आटा पीसने की चक्की भी पत्थार की हुआ करती थी. इसके अवाला, मसाला पीसने की सिल, बट्टा और चकला तैयार करके दूर-दूर तक भेजे जाते थे. हालांकि अब पत्थार के बर्तन तैयार करने वाले कारीगर कम हो गए हैं, लेकि फिर भी आज इस गांव में पत्थर के बर्तन इस्तेमाल किया जाते हैं.

पत्थर के बर्तन में खाते हैं, दाल बाटी चूरमा

अलवर के डोरोली गांव में एक पुराना हनुमान मंदिर (Hanuman Temple) है. इस मंदिर में दर्शन करने दूर-दूर से लोग आते हैं. मंदिर में लोग सवामणी और अन्य धार्मिक आयोजन भी करते हैं. बताया जाता है, कि इस मंदिर में दाल बाटी और चूरमा तैयार कर के हनुमानजी को भोग लगाया जाता है. ये परंपरा बहुत पुरानी है. मंदिर में भोजन के लिए विशेष प्रकार के पत्थर के बर्तनों का उपयोग किया जाता है. यहां आने वाले लोग इन्हीं पत्थर के बर्तनों में दाल बाट और चूरमा का प्रसाद ग्रहण करते हैं.

 

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