दिल्ली : कन्हैया से कंपैरिजन पर JNU के नए प्रेसिडेंट धनंजय ने कहा “जो वामपंथ छोड़ चुका हो वामपंथ उसकी बात नहीं करता…”

जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी JNU जो लेफ्ट की राजनीति का गढ़ माना जाता है। एक बार फिर इस यूनिवर्सिटी में लाल सलाम की जीत हुई है। इस जीत के साथ ही JNU को लगभग 3 दशक के बाद धनंजय के रुप में फिर से दलित प्रेसिडेंट मिला है। धनंजय से पहले साल 1996 में बत्तीलाल बैरवा जेएनयू के प्रेसिडेंट थे जो कि एक दलित नेता थे। और अब लगभग 28 साल बाद जेएनयू को उसका दूसरा दलित प्रेसिडेंट मिला। JNU के नए अध्यक्ष धनंजय बिहार के गया के रहने वाले हैं। JNU में PHD के स्टूडेंट हैं और देश के तमाम मुद्दों पर मुखर होकर अपनी बात रखते हैं।

 

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अध्यक्ष या दलित अध्यक्ष क्या ज्यादा अहम है, इस सवाल पर उन्होंने कहा, सिर्फ अध्यक्ष, क्योंकि JNU ने अपना प्रेसिडेंट चुना है, जहां हम फिस हाइक, फेलोशिप महिला सुरक्षा से लेकर किसानों के मुद्दे तक पर बात करते हैं। कन्हैया से कमपैरिज़न पर JNU के नए प्रेसिडेंट ने कहा जो वामपंथ छोड़ चुका हो वामपंथ उसकी बात नहीं करता।

 

आपको बता दें कि कन्हैया कुमार जो JNU के प्रेसिडेंट थे और एक वामपंथी नेता थे जिन्होंने अब कांग्रेस का दामन थाम लिया है। प्रेसिडेंट बनने पर घरवालों का रिएक्शन क्या था, घरवाले खुश थे या डरे हुए। इसपर वो मुस्कुराते हुए कहते हैं कि ज़ाहिर तौर पर परिवार वाले खुश हैं मगर उन्हें चिंता भी होती है और वो हर मां-बाप को होती है। फिर आगे वो उमर खालिद को याद करते हुए कहते हैं कि इस समय देश में मुसलमान होना ही ज़ुर्म हो गया है। मीडिया पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए वो कहते हैं कि मीडिया वाले हर चिज़ में ढूंढते रहते हैं कि कहीं कोई मुसलमान मिल जाए। वो आगे कहते हैं कि उमर खालिद एक मुखर वक्ता और नेता थे जिन्हे इस तानाशाही सरकार ने सलाखों के पिछे डाल दिया है। जेएनयू के राष्ट्रविरोधि इमेज पर भी वो अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि 2014 के बाद से ही एक साजिश के तहत जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल ये भाजपा और केन्द्र की सरकार को खटकता है कि कोई कैसे हमसे इतने तीखे सवाल पूछ सकता है।

 

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